रोहिणी व्रत कब है
वर्ष 2026 में रोहिणी व्रत 11 जुलाई, शनिवार को मनाया जाएगा। यह व्रत जैन कैलेंडर पर आधारित है और चंद्र तिथि के बजाय नक्षत्र गणना पर निर्भर करता है—अर्थात जिस दिन चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में गोचर करता है, उसी दिन रोहिणी व्रत रखा जाता है। यह नक्षत्र 27 नक्षत्रों में चौथा नक्षत्र माना जाता है और इसे ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है।
रोहिणी व्रत का महत्व
रोहिणी व्रत जैन समुदाय, विशेष रूप से श्वेतांबर और दिगंबर दोनों ही परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह व्रत जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी को समर्पित है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सम्यग्दर्शन सहित इस व्रत का नियमपूर्वक पालन करता है, उसके पुराने कर्मों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होकर कर्म-बंधन से मुक्ति की ओर अग्रसर होती है।
यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, जो अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इसे रखती हैं, हालांकि पुरुष भी इस व्रत का पालन कर सकते हैं। परंपरा के अनुसार यह व्रत लगातार 3, 5 या 7 वर्षों तक करने का विधान है, जिसके पश्चात ही इसका उद्यापन (समापन अनुष्ठान) किया जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार इस व्रत की पूर्ण अवधि 5 वर्ष 5 महीने मानी जाती है।
रोहिणी व्रत की पौराणिक कथा
जैन ग्रंथों में रोहिणी व्रत से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधव अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ राज्य करते थे। उनके सात पुत्र थे और रोहिणी नाम की एक कन्या भी थी। एक बार राजा ने अपनी पुत्री के भावी वर के विषय में निमित्तज्ञानी (भविष्यवक्ता) से प्रश्न किया। इस कथा में आगे यह वर्णन मिलता है कि किस प्रकार धर्म और सम्यग्दर्शन के मार्ग पर चलते हुए तथा रोहिणी व्रत का विधिवत पालन करते हुए संकटों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
एक अन्य कथा में धनमित्र नामक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है, जिसने अपने पूर्व जन्मों के पाप-कर्मों से मुक्ति पाने का उपाय पूछा था। तब स्वामी ने उसे बताया कि सम्यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत का पालन करने से, अर्थात प्रत्येक माह जिस दिन रोहिणी नक्षत्र आए उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्याग कर जिन चैत्यालय में जाकर सोलह प्रहर धर्मध्यान, सामायिक, स्वाध्याय, पूजा-अभिषेक आदि में समय व्यतीत करने से यह पातक दूर हो सकता है। इसी कथा के आधार पर रोहिणी व्रत को पांच वर्ष पांच महीने तक करने की परंपरा प्रचलित हुई।
पूजा विधि
रोहिणी व्रत के दिन श्रद्धालु प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं। पूजा के लिए भगवान वासुपूज्य की पंचरत्न, तांबे अथवा स्वर्ण की प्रतिमा की स्थापना की जाती है। मंदिर या घर के पूजा स्थल में दीप जलाकर भगवान वासुपूज्य की प्रतिमा के समक्ष फल, फूल, धूप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।
इस दिन कई श्रद्धालु पूर्ण उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग एकासन (दिन में एक बार भोजन) व्रत का पालन करते हैं। सूर्यास्त के पश्चात भोजन ग्रहण करना इस व्रत में वर्जित माना गया है। पूजा के दौरान सामायिक (समभाव की साधना), स्वाध्याय (धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन) तथा धर्म-चर्चा में समय व्यतीत करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देने का भी विशेष महत्व है।
व्रत के नियम
रोहिणी व्रत के दौरान संयम, दया और अहिंसा का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। जैन धर्म में जीव-दया को सर्वोच्च महत्व दिया गया है, इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार की हिंसा, क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। सात्विक आहार ग्रहण करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस व्रत का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रोहिणी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करने से जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। सुहागिन महिलाओं को इस व्रत से भगवान वासुपूज्य के आशीर्वाद से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत आत्मिक शुद्धि, कर्म-बंधन से मुक्ति तथा मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता है।
निष्कर्ष
11 जुलाई 2026 को पड़ने वाला रोहिणी व्रत जैन धर्म के अनुयायियों के लिए आत्म-संयम, भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण अवसर है। भगवान वासुपूज्य की आराधना से जुड़ा यह व्रत न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुख-शांति लाता है, बल्कि आत्मा को कर्म-बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है।



