चाक्षुष मन्वादि कब है
वर्ष 2026 में चाक्षुष मन्वादि 29 जुलाई, बुधवार को है, जो आषाढ़ मास की शुक्ल पूर्णिमा तिथि पर, गुरु पूर्णिमा के दिन ही पड़ती है। “मन्वादि” शब्द का अर्थ है किसी मन्वंतर का आरंभ दिवस, अर्थात यह वह विशेष तिथि है, जिस दिन पौराणिक गणना के अनुसार छठे मन्वंतर—चाक्षुष मन्वंतर—का आरंभ माना जाता है।
मन्वंतर की अवधारणा
हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में समय की गणना अत्यंत विशाल और सूक्ष्म रूप से की गई है। एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) को चौदह मन्वंतरों में विभाजित किया गया है, तथा प्रत्येक मन्वंतर पर एक विशिष्ट मनु का शासन होता है, जो उस काल में मानव जाति के आदि पुरुष तथा शासक माने जाते हैं। इन चौदह मनुओं के नाम हैं—स्वायंभुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्ष सावर्णि, ब्रह्म सावर्णि, धर्म सावर्णि, रुद्र सावर्णि, देव सावर्णि तथा इन्द्र सावर्णि।
वर्तमान समय में वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है, जो सातवां मन्वंतर है। इससे पूर्व छठा मन्वंतर चाक्षुष मन्वंतर था, जिसके आरंभ की तिथि को “चाक्षुष मन्वादि” के रूप में स्मरण किया जाता है। यह तिथि पंचांगों में विशेष रूप से अंकित की जाती है, ताकि सृष्टि-चक्र की इस प्राचीन गणना को स्मरण रखा जा सके।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक मन्वंतर की अवधि इकहत्तर चतुर्युगों के बराबर मानी गई है, और एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग—ये चारों युग सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार एक मन्वंतर की अवधि मानव गणना के अनुसार करोड़ों वर्षों में मापी जाती है, जो इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों की समय-गणना कितनी सूक्ष्म और वैज्ञानिक थी। प्रत्येक मन्वंतर के परिवर्तन के समय पृथ्वी पर एक बड़ा प्रलय अथवा रूपांतरण होता है, जिसके पश्चात नए मनु के नेतृत्व में सृष्टि का पुनर्निर्माण आरंभ होता है।
चाक्षुष मनु की पौराणिक कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चाक्षुष मनु ब्रह्मा जी के मानस पुत्र चक्षु के पुत्र थे, इसी कारण उन्हें “चाक्षुष” मनु कहा जाता है। कुछ पुराणों में उन्हें “चक्षुष” ऋषि की संतान भी बताया गया है। चाक्षुष मन्वंतर में अनेक महत्वपूर्ण देवताओं, ऋषियों तथा राजाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने इस काल में धर्म की स्थापना और सृष्टि के पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में यह भी वर्णन मिलता है कि प्रत्येक मन्वंतर में भगवान विष्णु किसी न किसी अवतार अथवा दिव्य स्वरूप में सृष्टि की रक्षा करते हैं। चाक्षुष मन्वंतर के अंत में आए जल-प्रलय से पूर्व भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर सत्यव्रत मनु (जो कालांतर में वैवस्वत मनु के नाम से प्रसिद्ध हुए) की रक्षा की थी, ऐसी पौराणिक कथा प्रचलित है, जो मन्वंतरों के परिवर्तन-चक्र की निरंतरता को दर्शाती है।
मन्वादि तिथि का धार्मिक महत्व
मन्वादि तिथियां हिंदू पंचांग में इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, क्योंकि ये सृष्टि के विशाल कालचक्र और समय की चक्रीय प्रकृति का स्मरण कराती हैं। ये तिथियां हमें यह सिखाती हैं कि सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है, तथा प्रत्येक युग और मन्वंतर के साथ नए शासक, नए ऋषि तथा नई व्यवस्थाएं स्थापित होती रहती हैं। यह गणना भारतीय ऋषियों की खगोलीय और कालगणना संबंधी गहन समझ का भी प्रमाण है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार मन्वादि तिथियों पर किया गया श्राद्ध, तर्पण तथा दान विशेष फलदायी माना जाता है। ब्रह्मपुराण तथा अन्य धर्मग्रंथों में मन्वादि तिथियों पर पितरों के निमित्त तर्पण करने का विशेष विधान बताया गया है, क्योंकि यह मान्यता है कि इन विशेष तिथियों पर किया गया श्राद्ध-कर्म पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति प्रदान करता है।
संकल्प मंत्र में मन्वंतर का उल्लेख
हिंदू धर्म में किसी भी पूजा, यज्ञ अथवा शुभ कार्य को आरंभ करने से पूर्व “संकल्प” लिया जाता है, जिसमें समय और स्थान का विस्तृत उल्लेख किया जाता है। इस संकल्प मंत्र में वर्तमान कल्प, मन्वंतर, युग, वर्ष, मास, पक्ष तथा तिथि का क्रमवार उच्चारण किया जाता है—जैसे “श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मन्वंतरे, कलियुगे, प्रथम चरणे” इत्यादि। इस परंपरा के कारण ही प्रत्येक हिंदू, चाहे वह किसी भी क्षेत्र अथवा संप्रदाय से संबंधित हो, अपने प्रतिदिन के पूजा-अनुष्ठान में इस विशाल कालचक्र का स्मरण करता है। चाक्षुष मन्वादि जैसी तिथियां इस बात को रेखांकित करती हैं कि वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर से पूर्व भी सृष्टि का अस्तित्व था, तथा समय की यह यात्रा अनंत काल से चली आ रही है।
पूजा और श्राद्ध विधि
चाक्षुष मन्वादि के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा है। इसमें जल में काले तिल और कुशा मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करना तथा ब्राह्मणों को भोजन कराना भी इस दिन का महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। चूंकि यह तिथि गुरु पूर्णिमा के साथ पड़ती है, इसलिए इस दिन गुरुओं का सम्मान करना भी उपयुक्त माना जाता है।
निष्कर्ष
29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के साथ मनाई जाने वाली चाक्षुष मन्वादि हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान की उस प्राचीन और विशाल कालगणना का प्रतीक है, जिसमें सृष्टि के प्रत्येक युग को सुव्यवस्थित रूप से विभाजित किया गया है। यह तिथि हमें समय की चक्रीय प्रकृति तथा पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है। श्रद्धापूर्वक इस दिन तर्पण और पूजा करने से पितृ दोष से मुक्ति तथा परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
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