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जगन्नाथ रथयात्रा 2026: तिथि, इतिहास, महत्व और पूरी परंपरा

जगन्नाथ रथयात्रा कब है

वर्ष 2026 में जगन्नाथ रथयात्रा 15 जुलाई, बुधवार को ओडिशा के पुरी नगर में आयोजित होगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। जगन्नाथ रथयात्रा विश्व की सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से पुरी पहुंचकर इस अद्भुत उत्सव के साक्षी बनते हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास और महत्व

पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार धामों में से एक है, जहां भगवान जगन्नाथ (भगवान कृष्ण का स्वरूप), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) तथा बहन सुभद्रा की पूजा की जाती है। वर्ष में एक बार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, इन तीनों देवताओं की विशाल लकड़ी की प्रतिमाओं को भव्य रूप से सजाए गए रथों पर विराजमान कर मंदिर से बाहर निकाला जाता है और गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करवाई जाती है, जो कि लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसे भगवान जगन्नाथ की “मौसी का घर” माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार यह यात्रा भगवान कृष्ण के मथुरा जाने की स्मृति में मनाई जाती है, जब वे अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ मथुरा गए थे। एक अन्य कथा के अनुसार यह यात्रा भगवान जगन्नाथ के अपनी मौसी के घर जाकर विशेष व्यंजनों का आनंद लेने की परंपरा को दर्शाती है। इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ सात दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहते हैं, जिसके पश्चात “बहुड़ा यात्रा” के रूप में उन्हें पुनः मुख्य मंदिर में वापस लाया जाता है।

तीन विशाल रथों का निर्माण

जगन्नाथ रथयात्रा की सबसे विशेष बात यह है कि प्रत्येक वर्ष तीनों देवताओं के लिए नए रथों का निर्माण किया जाता है, जो कुशल कारीगरों द्वारा पारंपरिक विधि से नीम की लकड़ी का उपयोग करके बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ को “नंदीघोष” कहा जाता है, जो लाल और पीले रंग का होता है। बलभद्र जी के रथ को “तालध्वज” कहा जाता है, जो लाल और हरे रंग का होता है, जबकि देवी सुभद्रा के रथ को “दर्पदलन” अथवा “पद्मध्वज” कहा जाता है, जो लाल और काले रंग का होता है।

इन रथों का निर्माण अक्षय तृतीया के दिन से आरंभ होता है और रथयात्रा से पहले पूर्ण किया जाता है। प्रत्येक रथ में चौदह-चौदह पहिए होते हैं और यह लगभग चौदह मीटर ऊंचा होता है। हजारों श्रद्धालु इन विशाल रथों को रस्सियों की सहायता से खींचते हैं, और यह मान्यता है कि रथ खींचने मात्र से ही व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

छेरा पहरा की परंपरा

जगन्नाथ रथयात्रा की एक अत्यंत विशेष परंपरा “छेरा पहरा” है, जिसमें पुरी के गजपति राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथ के सामने की भूमि तथा रथ को साफ करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान जगन्नाथ के समक्ष राजा और साधारण भक्त में कोई भेद नहीं है—सभी उनके समान सेवक हैं। यह परंपरा सामाजिक समानता और विनम्रता के महान संदेश को दर्शाती है।

पूजा और अनुष्ठान

रथयात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष स्नान “स्नान पूर्णिमा” के दिन होता है, जिसके पश्चात वे कुछ दिनों के लिए एकांतवास में चले जाते हैं, जिसे “अणसर” कहा जाता है। इस दौरान उनके दर्शन नहीं होते। रथयात्रा के दिन विशेष पूजा-अर्चना के पश्चात देवताओं को रथों पर विराजमान किया जाता है और भव्य शोभायात्रा के साथ यात्रा आरंभ होती है। इस दौरान भक्त भजन-कीर्तन करते हुए तथा “जय जगन्नाथ” के जयकारे लगाते हुए रथों के साथ चलते हैं।

धार्मिक और सामाजिक महत्व

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, समानता और भक्ति का प्रतीक भी है। यह यात्रा जाति, वर्ग और सामाजिक स्थिति के भेदभाव से परे होकर सभी भक्तों को एक समान भाव से भगवान की सेवा करने का अवसर प्रदान करती है। यह मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस यात्रा में भाग लेते हैं अथवा रथ खींचते हैं, उन्हें जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

निष्कर्ष

15 जुलाई 2026 को पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथयात्रा भारतीय संस्कृति की अद्भुत भव्यता, भक्ति और सामाजिक समानता का प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यह विश्वप्रसिद्ध यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमें प्रेम, समानता और सेवा भाव का भी संदेश देती है। श्रद्धापूर्वक इस यात्रा में सम्मिलित होकर भक्तों को भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।

casey jordan

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