भड़ली नवमी कब है
वर्ष 2026 में भड़ली नवमी 22 जुलाई, बुधवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है। इस तिथि को विभिन्न क्षेत्रों में भड़रिया नवमी, भड़ल्या नवमी, भढली नवमी, भादरिया नवमी, कंदर्प नवमी जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। यह तिथि विशेष रूप से विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भड़ली नवमी का महत्व – अबूझ मुहूर्त
भड़ली नवमी को हिंदू धर्म में “अबूझ मुहूर्त” के रूप में जाना जाता है। इसका अर्थ है कि इस दिन बिना किसी पंचांग गणना अथवा ग्रह-नक्षत्र के विचार के भी विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नया व्यापार आरंभ करने जैसे शुभ कार्य किए जा सकते हैं। बसंत पंचमी, अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी की भांति यह तिथि भी स्वयंसिद्ध शुभ मुहूर्त मानी जाती है, जिसके लिए किसी विशेष मुहूर्त गणना की आवश्यकता नहीं होती।
इस तिथि का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह चातुर्मास आरंभ होने से ठीक पहले पड़ने वाला विवाह का अंतिम शुभ मुहूर्त माना जाता है। भड़ली नवमी के दो दिन बाद ही देवशयनी एकादशी आती है, जिस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसके पश्चात अगले चार महीनों तक सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। इसी कारण जिन परिवारों में विवाह के लिए उपयुक्त मुहूर्त नहीं मिल पाता, वे इस अबूझ मुहूर्त में विवाह संपन्न कर सकते हैं।
गुप्त नवरात्रि का समापन
भड़ली नवमी का एक और विशेष महत्व यह है कि इसी दिन आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का भी समापन होता है। गुप्त नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है, और इसी के साथ गुप्त नवरात्रि की तांत्रिक साधनाएं भी पूर्ण होती हैं। इस प्रकार अबूझ मुहूर्त और गुप्त नवरात्रि के समापन का यह दुर्लभ संयोग भड़ली नवमी को अत्यंत शुभ और शक्तिशाली तिथि बनाता है।
भगवान विष्णु से संबंध
भड़ली नवमी का सीधा संबंध भगवान विष्णु से भी माना जाता है, क्योंकि यह चातुर्मास आरंभ होने से पहले की अंतिम महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करना तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से भक्तों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है और आने वाले चातुर्मास के दौरान भी उनका आशीर्वाद प्राप्त होता रहता है।
पूजा विधि
भड़ली नवमी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत तथा मिष्ठान्न का भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा अथवा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है।
इस दिन देवी पार्वती की भी पूजा की जाती है, जिनकी आराधना से धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। जो परिवार इस दिन विवाह अथवा अन्य मांगलिक कार्य संपन्न करना चाहते हैं, वे बिना किसी विशेष मुहूर्त गणना के भी इन कार्यों को कर सकते हैं। दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व है—गरीबों को भोजन कराना अथवा जरूरतमंदों को दान देना जीवन की समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
अन्य मांगलिक कार्यों के लिए महत्व
भड़ली नवमी को विवाह के अतिरिक्त सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, जनेऊ संस्कार तथा नया व्यापार आरंभ करने के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दिन गर्मी के मौसम के अंतिम शुभ मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि इसके पश्चात वर्षा ऋतु और चातुर्मास का प्रभाव आरंभ हो जाता है। हालांकि ज्योतिष शास्त्र में कुछ विद्वान अबूझ मुहूर्त की मान्यता को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते, फिर भी सामान्य जनमानस में यह तिथि अत्यंत लोकप्रिय और शुभ मानी जाती है।
निष्कर्ष
22 जुलाई 2026 को पड़ने वाली भड़ली नवमी चातुर्मास से पूर्व विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अंतिम अबूझ शुभ मुहूर्त है। गुप्त नवरात्रि के समापन के साथ जुड़ी यह तिथि आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जो परिवार इस विशेष अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उनके लिए भगवान विष्णु और माता पार्वती की कृपा से यह दिन शुभता और समृद्धि लेकर आता है।



