कालाष्टमी कब है
वर्ष 2026 में कालाष्टमी 7 जुलाई, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को “मासिक कालाष्टमी” के रूप में मनाया जाता है, और यह दिन भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव को समर्पित है। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण इस वर्ष की यह कालाष्टमी और भी विशेष मानी जा रही है, क्योंकि मंगलवार को भी भैरव जी की आराधना का विशेष दिन माना जाता है।
काल भैरव कौन हैं
शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार काल भैरव भगवान शिव के ही एक रौद्र और उग्र स्वरूप हैं। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी के अहंकार को दूर करने और उन्हें दंड देने के लिए भगवान शिव ने भैरव का रूप धारण किया था। भैरव जी को काशी नगरी का कोतवाल भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि वे इस पवित्र नगरी की रक्षा करते हैं और बिना उनके आशीर्वाद के काशी में विश्वनाथ जी के दर्शन भी अधूरे माने जाते हैं। भैरव जी के वाहन के रूप में काले कुत्ते को पूजनीय माना गया है, इसलिए कालाष्टमी के दिन कुत्तों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
काल भैरव को न्याय के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भैरव जी की उपासना करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता तथा शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा प्राप्त होती है। तंत्र साधना में भी काल भैरव का विशेष स्थान है, और अष्टमी की रात्रि को इनकी साधना के लिए सर्वाधिक शुभ माना जाता है।
कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
कालाष्टमी व्रत का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है। यह मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से भय, चिंता, नकारात्मक ऊर्जा और शत्रु बाधाएं दूर होती हैं। जिन लोगों की कुंडली में राहु-केतु अथवा शनि से संबंधित दोष होते हैं, उनके लिए भी काल भैरव की पूजा अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, यह भी विश्वास है कि भैरव जी की कृपा से व्यक्ति को साहस, आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना प्राप्त होती है।
वर्ष में सबसे बड़ी कालाष्टमी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है, जिसे “काल भैरव जयंती” या “भैरवाष्टमी” कहा जाता है, परंतु प्रत्येक माह की कालाष्टमी का भी अपना विशेष महत्व है। नियमित रूप से मासिक कालाष्टमी का व्रत करने वाले भक्तों को जीवन में स्थिरता, सुरक्षा और सफलता प्राप्त होने की मान्यता है।
पूजा विधि
कालाष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन की पूजा विशेष रूप से रात्रि के समय की जाती है, क्योंकि भैरव जी की आराधना के लिए रात्रि काल को अत्यंत शुभ माना गया है। पूजा स्थल पर काल भैरव की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित कर उन्हें काले तिल, सरसों का तेल, इमरती, उड़द की दाल से बने पकवान तथा नारियल अर्पित करना चाहिए।
भैरव जी को सरसों के तेल का दीपक जलाना विशेष फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान “ॐ भं भैरवाय नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए तथा भैरव अष्टक और भैरव चालीसा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। जो भक्त इस दिन काशी स्थित काल भैरव मंदिर या किसी अन्य भैरव मंदिर में दर्शन के लिए नहीं जा सकते, वे घर पर ही श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
व्रत के दौरान दिनभर उपवास रखा जाता है और रात्रि में पूजा-अर्चना के पश्चात ही फलाहार ग्रहण किया जाता है। इस दिन काले कुत्तों को भोजन कराना, विशेष रूप से मीठी रोटी या दूध-रोटी खिलाना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है, क्योंकि इसे भैरव जी की सेवा के समान समझा जाता है।
किन बातों का रखें ध्यान
कालाष्टमी के दिन क्रोध, वाद-विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। मांस-मदिरा का सेवन इस दिन पूर्णतः वर्जित माना गया है, हालांकि कुछ तांत्रिक परंपराओं में भैरव पूजा में विशेष विधान होते हैं, जिनका पालन केवल विधिवत दीक्षित साधक ही करते हैं। सामान्य गृहस्थ जनों के लिए सात्विक पूजा-विधि का पालन करना ही उचित और फलदायी माना जाता है।
निष्कर्ष
7 जुलाई 2026 को पड़ने वाली कालाष्टमी भगवान शिव के रक्षक और न्यायकारी स्वरूप काल भैरव की आराधना का विशेष अवसर है। यह व्रत भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को सुरक्षा, साहस और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। जो भी भक्त जीवन में स्थिरता और भय से मुक्ति चाहते हैं, उनके लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी सिद्ध हो सकता है।



