कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कब है
वर्ष 2026 में कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह तिथि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है, इसलिए इसे “कृष्णपिंगल” संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक चांद्रमास में दो चतुर्थी तिथियाँ आती हैं—एक शुक्ल पक्ष में जिसे विनायक चतुर्थी कहते हैं, और दूसरी कृष्ण पक्ष में जिसे संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। दोनों ही तिथियाँ भगवान गणेश को समर्पित हैं, परंतु संकष्टी चतुर्थी का महत्व विशेष रूप से संकटों के नाश और विघ्नों को दूर करने के लिए माना जाता है।
कृष्णपिंगल नाम का अर्थ और महत्व
द्रिक पंचांग की परंपरा में प्रत्येक माह की संकष्टी चतुर्थी को उस माह के अनुसार एक विशिष्ट नाम दिया गया है, जो अष्टविनायक अथवा गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों से संबंधित होता है। आषाढ़ मास में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को “कृष्णपिंगल संकष्टी” या कहीं-कहीं “गजानन संकष्टी चतुर्थी” के नाम से भी पुकारा जाता है। “पिंगल” शब्द भगवान गणेश के उन नामों में से एक है, जो उनके तेजस्वी और पीतवर्णी स्वरूप को दर्शाता है। यह मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस दिन व्रत रखते हैं, उनके जीवन के सभी संकट, बाधाएं और विघ्न भगवान गणेश की कृपा से दूर हो जाते हैं।
संकष्टी चतुर्थी व्रत का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले उनकी पूजा करने की परंपरा है, क्योंकि वे रिद्धि-सिद्धि के दाता और विघ्नहर्ता कहलाते हैं। संकष्टी चतुर्थी के व्रत की उत्पत्ति के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के जन्म तथा उनके गजमुख स्वरूप प्राप्त करने से जुड़ी है। एक अन्य कथा के अनुसार, जब देवताओं पर संकट आया था, तब उन्होंने भगवान गणेश की आराधना कर संकटों से मुक्ति पाई थी। इसी कारण चतुर्थी तिथि को “संकष्टी” अर्थात संकट को हरने वाली चतुर्थी कहा जाने लगा।
धार्मिक ग्रंथों में यह भी वर्णन मिलता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से न केवल व्यक्ति के व्यक्तिगत संकट दूर होते हैं, बल्कि पारिवारिक सुख-शांति, आर्थिक स्थिरता और संतान सुख की प्राप्ति भी होती है। विशेष रूप से जो लोग जीवन में किसी बड़ी समस्या, कर्ज, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी या कार्यक्षेत्र की बाधाओं से जूझ रहे हों, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
पूजा विधि
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रती को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। एक चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा में गणेश जी को दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर और मोदक अथवा लड्डू का भोग अवश्य अर्पित करना चाहिए, क्योंकि मोदक भगवान गणेश का अत्यंत प्रिय प्रसाद माना जाता है।
दिनभर उपवास रखते हुए भक्त गणेश मंत्रों का जाप, गणेश चालीसा का पाठ तथा संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का श्रवण करते हैं। संध्या समय पुनः पूजा-अर्चना कर चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा की जाती है। संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्रोदय के पश्चात चंद्र देव को अर्घ्य देकर ही व्रत का पारण किया जाता है, क्योंकि इस तिथि पर चंद्र दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व है। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय जल में कच्चा दूध, अक्षत और पुष्प मिलाना शुभ माना जाता है।
अर्घ्य देने के पश्चात भगवान गणेश की आरती की जाती है और परिवार के सभी सदस्य मिलकर मोदक तथा फलाहार ग्रहण कर व्रत का समापन करते हैं। कई स्थानों पर इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान करने की भी परंपरा है, जिसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
व्रत के नियम और सावधानियां
संकष्टी चतुर्थी के व्रत के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक माना जाता है। इस दिन तामसिक भोजन, मांस-मदिरा और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। व्रती को दिनभर संयम बरतते हुए ईश्वर की भक्ति में मन लगाना चाहिए। जो लोग निर्जल व्रत नहीं रख सकते, वे फलाहार करके भी यह व्रत पूर्ण कर सकते हैं। महिलाएं तथा पुरुष दोनों ही इस व्रत को कर सकते हैं, और यह विशेष रूप से संतान की दीर्घायु तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है।
निष्कर्ष
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 2026 में 3 जुलाई को पड़ने वाला यह व्रत भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का उत्तम अवसर प्रदान करता है। आषाढ़ मास में पड़ने वाली यह चतुर्थी विशेष रूप से जीवन के संकटों को दूर करने तथा नई शुरुआत में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए मनाई जाती है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को गणपति बप्पा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। यदि आप भी जीवन की किसी समस्या से जूझ रहे हैं, तो इस पावन तिथि पर विधिपूर्वक व्रत और पूजा करना अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।



