सोमवती अमावस्या कब है
वर्ष 2026 में सोमवती अमावस्या 13 जुलाई, सोमवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है। जब अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे “सोमवती अमावस्या” कहा जाता है, जो कि सामान्य अमावस्या की तुलना में अधिक शुभ और पुण्यदायी मानी जाती है। यह संयोग वर्ष में बहुत कम बार बनता है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
सोमवती अमावस्या का महत्व
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का संबंध पितरों की शांति, तर्पण तथा दान-पुण्य से माना जाता है। जब यह तिथि सोमवार को पड़ती है, तो इसे भगवान शिव की पूजा के लिए भी विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि सोमवार भगवान शिव का ही दिन है। इस दिन स्नान, दान और पितरों के निमित्त किए गए कार्यों का फल कई गुना अधिक माना जाता है।
पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि पीपल के वृक्ष में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है, तथा इस दिन पीपल की पूजा करने से अखंड सौभाग्य, संतान सुख और पितरों की कृपा प्राप्त होती है। सुहागिन महिलाएं इस दिन विशेष रूप से पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करती हैं और अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथा
सोमवती अमावस्या से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक ब्राह्मण की सात पुत्रवधुएं थीं, जिनमें से सबसे छोटी पुत्रवधू अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण थी। एक बार उसने अपनी सास से पूछा कि उनका सुहाग सदैव सुरक्षित कैसे रहता है। सास ने उसे बताया कि वह प्रत्येक सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करती हैं। यह सुनकर छोटी पुत्रवधू ने भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत करना आरंभ किया। कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से उसे अपने पति की असमय मृत्यु के संकट से मुक्ति मिली और उसका सुहाग सदैव अखंड रहा।
इसी कथा के आधार पर यह मान्यता प्रचलित हुई कि सोमवती अमावस्या का व्रत तथा पीपल पूजा करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
पूजा और स्नान विधि
सोमवती अमावस्या के दिन प्रातःकाल किसी पवित्र नदी, विशेष रूप से गंगा नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। जो लोग नदी तक नहीं जा सकते, वे घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के पश्चात सूर्य देव को जल का अर्घ्य देना चाहिए और पितरों के निमित्त तर्पण करना चाहिए।
इसके बाद पीपल के वृक्ष के समीप जाकर उसकी जड़ में जल, दूध और कच्चा सूत अर्पित किया जाता है। वृक्ष के तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटते हुए 108 बार परिक्रमा की जाती है और साथ ही मंत्रों का जाप किया जाता है। पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाना तथा धूप-अगरबत्ती दिखाना भी शुभ माना जाता है।
इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है, क्योंकि सोमवार शिव जी का दिन है जबकि अमावस्या विष्णु पूजा से भी जुड़ी है। पूजा के पश्चात गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र तथा धन का दान करना चाहिए, जो कि अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
पितृ तर्पण का महत्व
सोमवती अमावस्या का दिन पितरों की शांति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। जो लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म, पिंडदान अथवा तर्पण करना चाहते हैं, उनके लिए यह तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह मान्यता है कि इस दिन किए गए तर्पण और दान से पितृदोष का निवारण होता है तथा पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
व्रत के नियम और लाभ
सोमवती अमावस्या के दिन व्रत रखने वाले भक्तों को सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए तथा तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इस दिन क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या का व्रत करने से अखंड सौभाग्य, संतान सुख, पारिवारिक सुख-शांति तथा पितृदोष से मुक्ति प्राप्त होती है।
निष्कर्ष
13 जुलाई 2026 को पड़ने वाली सोमवती अमावस्या एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग है, जो पितरों की शांति, भगवान शिव की आराधना तथा अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रद्धापूर्वक स्नान, दान और पीपल पूजा करने से भक्तों को जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है। यह दिन पारिवारिक कल्याण और पूर्वजों के आशीर्वाद प्राप्त करने का एक उत्तम अवसर है।



