पार्वती जयंती कब है
वर्ष 2026 में पार्वती जयंती 21 जुलाई, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि है, जिस दिन मासिक दुर्गाष्टमी भी मनाई जाती है। यह दिन शक्ति की अधिष्ठात्री देवी, भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
माता पार्वती का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती हिमालय राज और उनकी पत्नी मैना के घर पुत्री के रूप में जन्मी थीं, इसी कारण उन्हें “हैमवती” तथा “गिरिजा” के नामों से भी जाना जाता है। यह मान्यता है कि माता पार्वती अपने पूर्वजन्म में सती थीं, जिन्होंने अपने पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत होकर यज्ञ कुंड में स्वयं को भस्म कर लिया था। इसके पश्चात उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया, ताकि पुनः भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त कर सकें।
माता पार्वती को शक्ति, सौंदर्य, समर्पण और तपस्या का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिसमें उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी भक्ति और संकल्प को कभी कमजोर नहीं होने दिया। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया, जिसे “शिव-पार्वती विवाह” के रूप में जाना जाता है।
माता पार्वती के विभिन्न स्वरूप
माता पार्वती को हिंदू धर्म में विभिन्न स्वरूपों में पूजा जाता है, जिनमें दुर्गा, काली, गौरी, अन्नपूर्णा, शैलपुत्री, अंबिका तथा भवानी प्रमुख हैं। वे शक्ति की मूल अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, जिनके बिना भगवान शिव भी अधूरे कहलाते हैं—इसी कारण “अर्धनारीश्वर” स्वरूप की कल्पना की गई, जिसमें शिव और शक्ति एक ही देह में समाहित दिखाए जाते हैं। माता पार्वती भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की माता भी हैं, जिन्हें बुद्धि, समृद्धि तथा साहस का देवता माना जाता है।
पार्वती जयंती का धार्मिक महत्व
पार्वती जयंती के दिन माता पार्वती की पूजा करने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति तथा पति की दीर्घायु की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। कुंवारी कन्याएं भी इस दिन माता पार्वती की आराधना कर मनचाहे वर की कामना करती हैं, क्योंकि माता पार्वती की तपस्या ही इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति और संकल्प से किसी भी इच्छा की पूर्ति संभव है।
यह दिन विशेष रूप से महिलाओं के लिए समर्पण, धैर्य और आंतरिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। माता पार्वती का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहकर अंततः सफलता प्राप्त की जा सकती है।
पूजा विधि
पार्वती जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माता पार्वती की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित किया जाता है। पूजा में माता को लाल पुष्प, सिंदूर, चूड़ियां, श्रृंगार सामग्री तथा मिष्ठान्न का भोग अर्पित किया जाता है, क्योंकि सुहाग की सामग्री माता पार्वती को अत्यंत प्रिय मानी जाती है।
पूजा के दौरान “ॐ पार्वत्यै नमः” मंत्र का जाप, पार्वती चालीसा, गौरी स्तोत्र तथा शिव-पार्वती विवाह कथा का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। साथ ही भगवान शिव की भी पूजा की जाती है, क्योंकि शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा को अधिक शुभ माना जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार करके माता पार्वती की पूजा करती हैं और अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और संध्या समय पूजा-अर्चना के पश्चात फलाहार ग्रहण कर व्रत का समापन करते हैं। इस दिन गरीब महिलाओं को सुहाग की सामग्री दान करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पार्वती जयंती का व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख तथा पारिवारिक समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए आत्मिक शक्ति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जाता है।
निष्कर्ष
21 जुलाई 2026 को पड़ने वाली पार्वती जयंती शक्ति, समर्पण और तपस्या की प्रतीक माता पार्वती के जन्मोत्सव का पावन अवसर है। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प से किसी भी असंभव लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकता है। श्रद्धापूर्वक इस दिन पूजा-अर्चना करने से भक्तों को माता पार्वती का विशेष आशीर्वाद, वैवाहिक सुख और जीवन में सकारात्मकता की प्राप्ति होती है।



