जयापार्वती व्रत कब से आरंभ है
वर्ष 2026 में जयापार्वती व्रत 26 जुलाई, रविवार से आरंभ होगा। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि से प्रारंभ होता है और कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि तक चलता है। इस व्रत को “विजया पार्वती व्रत” के नाम से भी जाना जाता है, तथा यह गौरी व्रत से घनिष्ठ रूप से संबंधित माना जाता है, क्योंकि दोनों ही व्रत माता पार्वती को समर्पित हैं और लगभग एक ही समयावधि में गुजरात में मनाए जाते हैं।
जयापार्वती व्रत का महत्व
जयापार्वती व्रत देवी “जया” को समर्पित एक महत्वपूर्ण उपवास पर्व है। देवी जया को माता पार्वती के ही एक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है, जिनका नाम “विजय” अथवा “सफलता” का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से गुजरात राज्य में मनाया जाता है और इसे अविवाहित कन्याओं तथा विवाहित स्त्रियों दोनों द्वारा किया जाता है।
अविवाहित कन्याएं इस व्रत का पालन सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं इस व्रत को अपने पति की दीर्घायु तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से करती हैं। यह मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि तथा खुशहाली का वास होता है।
जवारा पूजन विधि
जयापार्वती व्रत की सबसे विशेष और महत्वपूर्ण परंपरा “जवारा” पूजन है। व्रत के प्रथम दिन घर के पूजा स्थल में एक छोटे पात्र अथवा गमले में जौ या गेहूं के दाने बोए जाते हैं, जिन्हें जवारा कहा जाता है। इसके पश्चात पांच दिनों तक इस जवारा पात्र की नियमित रूप से पूजा की जाती है।
पूजा के दौरान सूती धागे से बना एक विशेष हार तैयार किया जाता है, जिसे “नगला” कहा जाता है। इस नगला को कुमकुम अथवा सिंदूर से सजाकर जवारा के पात्र के साथ स्थापित किया जाता है। यह अनुष्ठान पांच दिनों तक निरंतर चलता है, जिसमें प्रत्येक सुबह जवारा के दानों को जल अर्पित किया जाता है। यह प्रक्रिया माता पार्वती की तपस्या तथा नई शुरुआत के प्रतीक के रूप में देखी जाती है, जिसमें बीज से नए जीवन का अंकुरण होता है।
जयापार्वती जागरण
गौरी तृतीया पूजा के एक दिन पहले, अर्थात उपवास के अंतिम दिन, जब प्रातःकाल की पूजा के पश्चात उपवास तोड़ा जाता है, उस रात्रि को स्त्रियां विशेष रूप से जागरण करती हैं। इस रात्रि में वे पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए माता की आराधना और ध्यान में लीन रहती हैं। धार्मिक भजनों तथा रात्रि जागरण की इस विशेष प्रथा को “जयापार्वती जागरण” के नाम से जाना जाता है, जो इस व्रत का सबसे भावपूर्ण भाग माना जाता है, जिसमें सामूहिक रूप से महिलाएं एकत्रित होकर देवी की स्तुति करती हैं।
व्रत का समापन और नगला विसर्जन
व्रत के छठे दिन स्नान करने के पश्चात जवारा के पात्र में से जवारा के अंकुरित पौधे निकालकर उन्हें किसी बगीचे अथवा जल स्रोत में विसर्जित किया जाता है। इस दिन माताजी के मंदिर में जाकर पूर्ण विधि-विधान से व्रत तोड़ा जाता है। व्रत के दौरान नमक रहित भोजन ग्रहण करना अनिवार्य माना जाता है, तथा गेहूं से बने उत्पादों और कुछ सब्जियों का त्याग किया जाता है। समापन के दिन नमक और गेहूं सहित पूर्ण भोजन ग्रहण किया जाता है।
पूजा सामग्री और विधि
जयापार्वती व्रत में मुख्य रूप से माता पार्वती के जया स्वरूप की पूजा की जाती है, साथ ही भगवान शिव की भी आराधना की जाती है। पूजा में लाल पुष्प, कुमकुम, चूड़ियां, श्रृंगार सामग्री तथा मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। पूजन के लिए एक शुभ मुहूर्त निकाला जाता है, जिसे “जयापार्वती प्रदोष पूजा मुहूर्त” कहा जाता है, जो सामान्यतः संध्या समय, प्रदोष काल में होता है।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जयापार्वती व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करने से सुहागिन स्त्रियों को अखंड सुहाग की प्राप्ति होती है, तथा कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर मिलता है। यह व्रत घर-परिवार में खुशियां लाने वाला तथा वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने वाला माना जाता है। इस व्रत की विशेष विधियों का पालन करने से महिलाओं में आत्मिक शांति और सकारात्मकता का भी संचार होता है।
निष्कर्ष
26 जुलाई 2026 से आरंभ होने वाला जयापार्वती व्रत माता पार्वती की भक्ति, श्रद्धा और सामाजिक परंपरा का एक सुंदर संगम है। जवारा पूजन और रात्रि जागरण जैसी विशेष परंपराओं से युक्त यह व्रत गुजराती समाज में महिलाओं और कन्याओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अनुष्ठान माना जाता है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को माता की विशेष कृपा तथा सुखमय जीवन की प्राप्ति होती है।



