गौरी व्रत समापन कब है
वर्ष 2026 में गौरी व्रत का समापन 29 जुलाई, बुधवार को होगा, जो गुरु पूर्णिमा के दिन ही संपन्न होता है। यह व्रत 25 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल एकादशी से आरंभ हुआ था और पांच दिनों की साधना के पश्चात पूर्णिमा तिथि को इसका विधिवत समापन किया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से गुजरात में कुंवारी कन्याओं और सुहागिन महिलाओं द्वारा माता पार्वती (गौरी) को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है।
गौरी व्रत समापन का महत्व
गौरी व्रत का समापन आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा, अर्थात गुरु पूर्णिमा के दिन होना इस व्रत को अत्यंत विशेष बनाता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस व्रत में कन्याएं तथा महिलाएं नमक रहित सात्विक भोजन ग्रहण करते हुए माता गौरी की उपासना करती हैं, और अंतिम दिन विधिवत समापन के साथ यह व्रत पूर्ण होता है। यह दिन व्रती कन्याओं और महिलाओं के लिए अत्यंत पावन माना जाता है, क्योंकि इसी दिन माता गौरी की आराधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
यह व्रत विशेषकर अविवाहित कन्याओं द्वारा माता गौरी की कृपा पाने हेतु श्रद्धा भाव से रखा जाता है, ताकि उन्हें शिवजी के समान सुयोग्य वर की प्राप्ति हो सके। व्रती कन्याएं पांच दिन तक मां गौरी की पूजा करती हैं, सात्विक जीवनशैली का पालन करती हैं और अंत में विधिवत समापन के साथ व्रत को पूर्ण करती हैं।
समापन और पारण की विधि
गौरी व्रत के समापन दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके पश्चात घर के पूजा स्थल में स्थापित जवारा के पात्र की अंतिम बार पूजा की जाती है, जिसमें धूप-दीप, पुष्प तथा नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजा के पश्चात जवारा को पात्र से निकालकर किसी बगीचे, पवित्र वृक्ष के समीप अथवा जल स्रोत में विसर्जित किया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि व्रत के दौरान अंकुरित हुआ नया जीवन अब प्रकृति में वापस लौट रहा है।
समापन के दिन कन्याएं तथा महिलाएं माता गौरी के मंदिर में जाकर पूर्ण विधि-विधान से व्रत का पारण करती हैं। इस दिन पांच दिनों के नमक-रहित भोजन के पश्चात पहली बार नमक और गेहूं सहित पूर्ण भोजन ग्रहण किया जाता है। मंदिर में माता गौरी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें उन्हें सुहाग की सामग्री, चूड़ियां, सिंदूर तथा वस्त्र अर्पित किए जाते हैं।
माता गौरी की विदाई
गौरी व्रत समापन की सबसे भावपूर्ण परंपरा माता गौरी को दी जाने वाली “विदाई” है। इस दिन माता गौरी को इस प्रकार विदा किया जाता है, जैसे किसी सुहागिन कन्या को उसके ससुराल विदा किया जाता हो। यह परंपरा माता पार्वती के भगवान शिव के साथ विवाह के पश्चात उनके ससुराल कैलाश जाने की स्मृति को दर्शाती है। यह भावुक क्षण व्रती कन्याओं और महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह उनके स्वयं के भावी वैवाहिक जीवन का प्रतीकात्मक पूर्वाभ्यास भी माना जाता है।
पूजा सामग्री और अंतिम अनुष्ठान
समापन के दिन पूजा में माता गौरी की प्रतिमा को नए वस्त्र, आभूषण तथा श्रृंगार सामग्री से सजाया जाता है। परिवार और मित्रगण एकत्रित होकर सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करते हैं तथा माता की आरती की जाती है। इस अवसर पर विशेष पकवान भी तैयार किए जाते हैं, जिन्हें प्रसाद के रूप में सभी को वितरित किया जाता है। कई परिवार इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने तथा गरीब कन्याओं को दान देने की भी परंपरा निभाते हैं।
व्रत समापन का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गौरी व्रत का पूर्ण विधि-विधान से समापन करने से व्रती कन्याओं को शीघ्र ही सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है, जबकि सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह मान्यता है कि जो कन्याएं श्रद्धापूर्वक इस व्रत को पूर्ण करती हैं, उनके जीवन में माता पार्वती के समान ही सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती है। इसके साथ ही, यह व्रत परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाने वाला भी माना जाता है।
निष्कर्ष
29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के पावन दिन संपन्न होने वाला गौरी व्रत समापन गुजराती परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध अवसर है। पांच दिनों की भक्ति और साधना के पश्चात माता गौरी की विदाई का यह क्षण कन्याओं और महिलाओं के जीवन में श्रद्धा, समर्पण और आशा का संचार करता है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का समापन करने से भक्तों को माता गौरी की विशेष कृपा तथा सुखमय वैवाहिक जीवन की प्राप्ति होती है।



