व्यास पूजा कब है
वर्ष 2026 में व्यास पूजा 29 जुलाई, बुधवार को मनाई जाएगी, जो गुरु पूर्णिमा के दिन ही संपन्न होती है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। व्यास पूजा विशेष रूप से महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास, जिन्हें वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है, के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए समर्पित है।
महर्षि वेदव्यास कौन थे
महर्षि वेदव्यास भारतीय इतिहास और पौराणिक साहित्य के सबसे महान ऋषियों में से एक माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार वे ऋषि पराशर और सत्यवती (मत्स्यगंधा) के पुत्र थे। उनका जन्म एक द्वीप पर हुआ था, इसी कारण उन्हें “द्वैपायन” कहा जाता है, तथा उनका शरीर वर्ण श्याम होने के कारण उन्हें “कृष्ण द्वैपायन” भी कहा जाता है। जन्म से ही वे असाधारण बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न थे।
महर्षि वेदव्यास को हिंदू धर्म के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक और आध्यात्मिक योगदान देने वाले ऋषि के रूप में जाना जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है, जिन्होंने मानवता के कल्याण के लिए ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।
वेदों का विभाजन
प्राचीन काल में वेद एक ही विशाल और अखंड रूप में विद्यमान थे, जिनका अध्ययन करना सामान्य मनुष्यों के लिए अत्यंत कठिन था। महर्षि वेदव्यास ने मानवता के कल्याण के लिए इस विशाल वैदिक ज्ञान को चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में विभाजित किया, ताकि सामान्य जन भी इनका अध्ययन और आचरण कर सकें। इसी महान कार्य के कारण उन्हें “वेदव्यास” की उपाधि प्राप्त हुई, जिसका अर्थ है “वेदों का विभाजन करने वाले ऋषि”।
महाभारत की रचना
महर्षि वेदव्यास की सबसे प्रसिद्ध कृति महाभारत है, जो विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है। इस महाकाव्य में उन्होंने कुरु वंश के इतिहास, पांडवों और कौरवों के बीच हुए महायुद्ध, तथा धर्म, नीति और जीवन के गूढ़ रहस्यों का विस्तृत वर्णन किया है। महाभारत के अंतर्गत ही श्रीमद्भगवद्गीता का समावेश है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश संपूर्ण विश्व के लिए आज भी मार्गदर्शक माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना का संकल्प लिया, तब उन्होंने भगवान गणेश से इसे लिपिबद्ध करने का आग्रह किया। भगवान गणेश ने एक शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे, और महर्षि व्यास को भी बिना रुके श्लोकों का उच्चारण करना होगा। इस प्रकार महर्षि व्यास के मुखेच्चारण और भगवान गणेश की लेखनी से यह महान ग्रंथ पूर्ण हुआ।
पुराणों की रचना और अन्य योगदान
महर्षि वेदव्यास को अठारह पुराणों की रचना का श्रेय भी दिया जाता है, जिनमें भागवत पुराण, विष्णु पुराण, शिव पुराण आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने ब्रह्मसूत्र की भी रचना की, जो वेदांत दर्शन का मूल आधार माना जाता है। उनके इस अद्वितीय योगदान के कारण उन्हें “आदिगुरु” की उपाधि दी गई है, और भारतीय परंपरा में ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में उनका सम्मान किया जाता है।
व्यास पूजा विधि
व्यास पूजा के दिन गुरु पूर्णिमा के समान ही विधि-विधान से पूजा की जाती है। प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर महर्षि वेदव्यास की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित किया जाता है, जिनकी पूजा पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य अर्पित करके की जाती है। पूजा के दौरान महाभारत, भगवद्गीता अथवा पुराणों के अंशों का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
गुरुकुल परंपरा से जुड़े शिक्षक तथा विद्यार्थी इस दिन विशेष रूप से महर्षि वेदव्यास का स्मरण करते हैं और उनसे ज्ञान तथा बुद्धि के आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं। कथावाचक तथा पुराणों का पाठ करने वाले विद्वान भी इस दिन महर्षि व्यास की पूजा कर अपने कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
धार्मिक महत्व
व्यास पूजा हमें यह स्मरण कराती है कि ज्ञान को सुव्यवस्थित और सुलभ रूप में प्रस्तुत करना कितना महत्वपूर्ण कार्य है। महर्षि वेदव्यास का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा गुरु वह है, जो अपने ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखकर समस्त मानवता के कल्याण के लिए समर्पित कर दे।
निष्कर्ष
29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के साथ मनाई जाने वाली व्यास पूजा भारतीय ज्ञान परंपरा के सबसे महान ऋषि महर्षि वेदव्यास के प्रति श्रद्धांजलि का एक पावन अवसर है। वेदों के विभाजन से लेकर महाभारत की रचना तक, उनका योगदान अतुलनीय है। श्रद्धापूर्वक इस दिन उनकी पूजा करने से भक्तों को ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।



