आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व का समापन कब है
वर्ष 2026 में आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व का समापन 29 जुलाई, बुधवार को होगा, जो गुरु पूर्णिमा के दिन ही संपन्न होता है। यह पर्व 20 जुलाई को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से आरंभ हुआ था और आठ दिनों की भक्तिपूर्ण साधना के पश्चात पूर्णिमा तिथि को इसका विधिवत समापन किया जाता है।
अष्टाह्निका पर्व समापन का महत्व
जैन धर्म में अष्टाह्निका पर्व वर्ष में तीन बार—कार्तिक, फाल्गुन तथा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में—मनाया जाता है, जिसमें अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिनों तक निरंतर पूजा-अर्चना की जाती है। इन आठ दिनों के दौरान स्वर्गलोक से देवगण नंदीश्वर द्वीप पहुंचकर वहां स्थित 52 शाश्वत जिनालयों में निरंतर पूजा करते हैं। पूर्णिमा तिथि को इस दिव्य पूजा का समापन होता है, इसलिए यह तिथि विशेष रूप से पूर्णाहुति और उद्यापन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
आठ दिनों तक चलने वाली इस तपस्या के समापन दिन जैन श्रद्धालु विशेष रूप से भावविभोर होकर पूजा करते हैं, क्योंकि यह मान्यता है कि इन आठ दिनों की सच्ची भक्ति-साधना से मिलने वाला पुण्य फल सामान्य छह महीने की पूजा से भी कहीं अधिक होता है। समापन दिवस इस संपूर्ण पुण्य-अर्जन का चरम बिंदु माना जाता है।
समापन दिवस की पूजा विधि
अष्टाह्निका पर्व के समापन दिन जैन मंदिरों में विशेष रूप से भव्य पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस दिन सिद्धचक्र मंडल विधान तथा नंदीश्वर विधान की पूर्णाहुति की जाती है, जिसमें आठ दिनों तक चली पूजा-प्रक्रिया का समापन विशेष हवन तथा मंगल कलश अभिषेक के साथ किया जाता है। श्रद्धालु जो निरंतर आठ दिनों तक उपवास कर रहे थे, वे इस दिन अपने व्रत का पारण करते हैं।
जो भक्त “कोमली अठाई” (हल्के उपवास) का पालन कर रहे थे, वे भी इस दिन अपने व्रत को पूर्ण करते हैं। समापन दिवस पर मंदिरों में तीर्थंकरों का विशेष अभिषेक किया जाता है, जिसमें स्वर्ण कलशों में भरे सुगंधित जल से प्रतिमाओं का स्नान कराया जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे नंदीश्वर द्वीप में देवेन्द्र महान विभूति के साथ यह अभिषेक करते हैं।
मैना सुंदरी की कथा का स्मरण
समापन दिवस पर विशेष रूप से मैना सुंदरी और उनके पति श्रीपाल की प्रसिद्ध कथा का स्मरण किया जाता है, जिन्होंने आठ दिनों तक सिद्धचक्र विधान की साधना कर कुष्ठ रोग से मुक्ति प्राप्त की थी। यह कथा भक्तों को यह प्रेरणा देती है कि सच्ची श्रद्धा और नियमित साधना से जीवन की सबसे कठिन बाधाओं को भी दूर किया जा सकता है। इस दिन कथा-श्रवण तथा धार्मिक प्रवचन का आयोजन भी किया जाता है।
उद्यापन और दान-पुण्य
अष्टाह्निका पर्व के समापन के अवसर पर कई श्रद्धालु उद्यापन (व्रत की पूर्णता का विशेष अनुष्ठान) भी करते हैं, जिसमें विशेष पूजा सामग्री, धार्मिक ग्रंथ तथा दान-पुण्य का आयोजन किया जाता है। इस दिन जैन मंदिरों में भोजन-प्रसाद (साधर्मिक वात्सल्य) का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी श्रद्धालु एक साथ भोजन ग्रहण करते हैं। जरूरतमंदों तथा साधु-साध्वियों की सेवा करना भी इस दिन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
अष्टाह्निका पर्व का समापन हमें यह सिखाता है कि किसी भी दीर्घकालिक साधना का सफल समापन ही उसकी वास्तविक सार्थकता को सिद्ध करता है। आठ दिनों तक निरंतर तप, ध्यान और भक्ति करने के पश्चात प्राप्त होने वाली आत्मिक शांति और संतोष अतुलनीय माना जाता है। यह पर्व जैन धर्म के अनुयायियों को संयम, अनुशासन तथा निरंतरता के महत्व की गहन शिक्षा देता है।
यह भी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस संपूर्ण आठ दिवसीय साधना को बिना किसी बाधा के पूर्ण करते हैं, उनके पुराने कर्मों का व्यापक रूप से क्षय होता है और वे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर तीव्र गति से अग्रसर होते हैं।
व्रत के नियम
समापन दिवस पर भी श्रद्धालु अहिंसा, सत्य और संयम का कठोरता से पालन करते हैं। पारण से पूर्व विधिवत पूजा-अर्चना करना तथा गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त करना इस दिन का मुख्य अनुष्ठान माना जाता है।
निष्कर्ष
29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के दिन संपन्न होने वाला आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व का समापन जैन धर्म के अनुयायियों के लिए आठ दिनों की गहन साधना की पूर्णता और आत्मिक संतोष का एक विशेष अवसर है। मैना सुंदरी की कथा से प्रेरित यह पर्व हमें निरंतर भक्ति और संयम का महत्व सिखाता है। श्रद्धापूर्वक इस पर्व का समापन करने से भक्तों को कर्म-बंधन से मुक्ति तथा गहन आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।




