कृष्ण रामलक्ष्मण द्वादशी कब है
वर्ष 2026 में कृष्ण रामलक्ष्मण द्वादशी 11 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि है, जो योगिनी एकादशी के अगले दिन पड़ती है। हिंदू पंचांग में द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु और उनके विभिन्न अवतारों की पूजा के लिए समर्पित माना गया है, और यह तिथि विशेष रूप से भगवान श्रीराम एवं उनके अनुज लक्ष्मण जी की आराधना से जुड़ी है।
रामलक्ष्मण द्वादशी का पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम को भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है, जबकि लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार कहा जाता है। यह द्वादशी तिथि इन दोनों भाइयों के अटूट प्रेम, त्याग, कर्तव्यपरायणता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि त्रेता युग में अयोध्या नरेश राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति की कामना से इसी द्वादशी तिथि का व्रत विधिपूर्वक किया था। इसी व्रत के प्रभाव से उन्हें श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति हुई थी।
इस तिथि को “चंपक द्वादशी” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान को चंपा के पुष्पों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। सामान्यतः रामलक्ष्मण द्वादशी ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी के अगले दिन शुक्ल पक्ष में विशेष रूप से मनाई जाती है, परंतु द्रिक पंचांग की मासिक द्वादशी परंपरा के अनुसार प्रत्येक द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है, और आषाढ़ कृष्ण पक्ष की इस द्वादशी को भी श्रीराम-लक्ष्मण की स्मृति में पूजनीय माना गया है। ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर सहित कई क्षेत्रों में इस तिथि को उत्कल ब्राह्मणों के लिए विशेष शुभ माना जाता है और भगवान जगन्नाथ के समक्ष भी इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
भगवान राम और लक्ष्मण के भाईचारे का प्रतीक
रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में भाईचारे और पारिवारिक मूल्यों के आदर्श का प्रतीक भी है। रामायण में वर्णित है कि लक्ष्मण जी ने अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रति असीम समर्पण दिखाते हुए चौदह वर्ष का वनवास उनके साथ स्वेच्छा से स्वीकार किया था। उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं को त्यागकर वन में कंद-मूल खाकर जीवन व्यतीत किया, केवल इसलिए कि अपने भाई की सेवा और रक्षा कर सकें। यह त्याग और भक्ति आज भी भारतीय समाज में आदर्श भ्रातृ-प्रेम का उदाहरण माना जाता है।
इस दिन भगवान राम और लक्ष्मण के साथ-साथ माता सीता की भी पूजा की जाती है, क्योंकि तीनों को एक साथ पूजने की परंपरा रामायण की मूल भावना—धर्म, त्याग और सेवा—को दर्शाती है। कुछ परंपराओं में इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की भी आराधना की जाती है, क्योंकि श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों को ही विष्णु का अवतार माना गया है।
पूजा विधि
कृष्ण रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए। इसके पश्चात एक चौकी पर पीला अथवा लाल वस्त्र बिछाकर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करना चाहिए। पूजा में भगवान को पीले या सफेद पुष्प, विशेष रूप से चंपा के फूल, चंदन, अक्षत तथा मौसमी फल अर्पित करने चाहिए।
पूजा के दौरान “श्री राम जय राम जय जय राम” मंत्र का जाप, रामरक्षा स्तोत्र तथा हनुमान चालीसा का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखने की भी परंपरा है, जिसमें फलाहार ग्रहण किया जा सकता है। संध्या समय आरती करने के पश्चात परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
इस तिथि पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान करना, विशेष रूप से पीले वस्त्र और चने की दाल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। जो भक्त संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से फलदायी माना जाता है, क्योंकि राजा दशरथ को इसी व्रत के प्रभाव से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस द्वादशी व्रत को करने से जीवन के समस्त पाप नष्ट होते हैं, पारिवारिक कलह समाप्त होता है और भाई-बहनों के बीच प्रेम तथा सामंजस्य बढ़ता है। इसके अतिरिक्त संतान सुख, मानसिक शांति और सुरक्षा की भावना भी प्राप्त होती है। इस दिन निश्छल मन से पूजा करने वाले भक्तों को भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
11 जुलाई 2026 को पड़ने वाली कृष्ण रामलक्ष्मण द्वादशी भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के आदर्श भाईचारे, त्याग और भक्ति की स्मृति में मनाया जाने वाला एक पावन दिवस है। यह दिन हमें सिखाता है कि परिवार में प्रेम, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा से बड़ा कोई धन नहीं है। श्रद्धापूर्वक इस दिन पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और पारिवारिक सामंजस्य की प्राप्ति होती है।



