मासिक कार्तिगाई कब है
वर्ष 2026 में मासिक कार्तिगाई 10 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह तिथि चंद्र पंचांग पर आधारित नहीं होकर सूर्य के नक्षत्र गोचर पर आधारित है, अर्थात जिस दिन चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में गोचर करता है, उस दिन को कार्तिगाई के रूप में मनाया जाता है। यह मुख्यतः दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु और केरल में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला पर्व है।
कार्तिगाई का महत्व
कार्तिगाई पर्व भगवान शिव के पुत्र भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) तथा भगवान शिव दोनों को समर्पित माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कार्तिकेय का पालन-पोषण छह कृत्तिका देवियों द्वारा किया गया था, इसी कारण उनका एक नाम “कार्तिकेय” पड़ा और कृत्तिका नक्षत्र से जुड़ी यह तिथि उन्हीं के सम्मान में मनाई जाती है। दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन को युद्ध के देवता, साहस और शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, और उनके भक्त प्रत्येक माह की कार्तिगाई तिथि पर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
इसके अतिरिक्त, कार्तिगाई तिथि को भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को समाप्त करने के लिए भगवान शिव ने अनंत ज्योति स्तंभ का रूप धारण किया था। इसी घटना की स्मृति में कार्तिगाई के दिन दीप जलाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो कि वर्ष में सबसे बड़े रूप में “कार्तिगाई दीपम” उत्सव के रूप में वृश्चिक मास (नवंबर-दिसंबर) में मनाई जाती है। परंतु प्रत्येक माह की कार्तिगाई तिथि को भी छोटे स्तर पर इसी परंपरा का पालन करते हुए दीप जलाए जाते हैं।
पूजा विधि
मासिक कार्तिगाई के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इस दिन घर के मुख्य द्वार तथा पूजा स्थल पर घी अथवा तिल के तेल के दीपक जलाने की परंपरा है। भगवान शिव और भगवान मुरुगन की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर पुष्प, धूप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
इस दिन विशेष रूप से मंदिरों में जाकर भगवान मुरुगन के दर्शन करना तथा उनके मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। “ॐ सरवणभवाय नमः” मंत्र का जाप भगवान कार्तिकेय की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। कई परिवारों में इस दिन संध्या के समय घर के प्रत्येक कोने में दीपक जलाने की भी परंपरा है, जिसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने वाला माना जाता है।
तमिल परंपरा में इस दिन विशेष रूप से “कार्तिगाई पूजा” की जाती है, जिसमें महिलाएं घर के आंगन में सुंदर कोलम (रंगोली) बनाकर उसके मध्य में दीपक स्थापित करती हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन उपवास रखकर शाम को दीप प्रज्ज्वलित करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
कार्तिगाई पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान भी है। यह पर्व प्रकाश और अंधकार के प्रतीकात्मक संघर्ष को दर्शाता है, जिसमें दीपक जलाकर अज्ञानता के अंधकार को दूर करने तथा ज्ञान के प्रकाश को फैलाने का संदेश दिया जाता है। यह मान्यता है कि जो भक्त नियमित रूप से मासिक कार्तिगाई का व्रत रखते हैं और दीप-पूजा करते हैं, उन्हें भगवान शिव और मुरुगन दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
भगवान मुरुगन के भक्तों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उन्हें साहस, बुद्धि और विजय का देवता माना जाता है। छात्रों और विद्यार्थियों के लिए भी इस दिन पूजा करना शुभ माना जाता है, क्योंकि भगवान मुरुगन को ज्ञान और विद्या का भी आशीर्वाद देने वाला माना जाता है।
व्रत और आहार नियम
कार्तिगाई के दिन कुछ भक्त पूर्ण उपवास रखते हैं, जबकि अन्य फलाहार करके भी व्रत का पालन करते हैं। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करने, मांस-मदिरा से दूर रहने तथा दिनभर सकारात्मक विचारों में मन लगाने की सलाह दी जाती है। संध्या समय दीप-पूजा के पश्चात ही व्रत का पारण करना उचित माना जाता है।
निष्कर्ष
10 जुलाई 2026 को मनाई जाने वाली मासिक कार्तिगाई भगवान शिव और भगवान मुरुगन की आराधना का एक सुंदर अवसर है, जो विशेष रूप से दक्षिण भारतीय परंपरा में गहराई से रचा-बसा है। दीपक जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व जीवन में सकारात्मकता, ज्ञान और समृद्धि लाने वाला माना जाता है। श्रद्धापूर्वक इस दिन पूजा-अर्चना करने से भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।



