योगिनी एकादशी कब है
वर्ष 2026 में योगिनी एकादशी 10 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, और वर्ष भर में पड़ने वाली सभी चौबीस एकादशियों में से प्रत्येक का अपना विशेष नाम, कथा और महत्व है। आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी को “योगिनी एकादशी” कहा जाता है, जो कि भगवान विष्णु को समर्पित है।
योगिनी एकादशी का महत्व
पद्म पुराण और स्कंद पुराण में योगिनी एकादशी के व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस व्रत का माहात्म्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था। मान्यता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन के सभी पाप नष्ट होते हैं और उसे अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यह भी माना जाता है कि इस व्रत को करने से कुष्ठ रोग, पिशाच बाधा तथा अन्य असाध्य समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है।
आषाढ़ मास वर्षा ऋतु का आरंभिक महीना होता है, और इस समय भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि इसके पश्चात आने वाली देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चातुर्मास के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए योगिनी एकादशी को चातुर्मास प्रारंभ होने से पहले की अंतिम महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना जाता है, जिस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं।
योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
योगिनी एकादशी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, अलकापुरी में कुबेर नामक एक राजा राज्य करते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके दरबार में हेम माली नामक एक माली प्रतिदिन शिव पूजा के लिए फूल लाने का कार्य करता था। एक दिन हेम माली अपनी पत्नी के मोह में इतना लीन हो गया कि वह समय पर फूल नहीं ला सका, जिससे कुबेर की पूजा में विघ्न उत्पन्न हुआ। इस बात से क्रोधित होकर कुबेर ने हेम माली को श्राप दे दिया कि वह कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर अपनी पत्नी से सदा के लिए अलग हो जाएगा।
श्राप के प्रभाव से हेम माली कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया और वन-वन भटकने लगा। भटकते हुए वह एक दिन मार्कंडेय ऋषि के आश्रम पहुंचा और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। दयालु ऋषि मार्कंडेय ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने की सलाह दी। हेम माली ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया, जिसके प्रभाव से वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया और पुनः अपनी दिव्य देह तथा अपनी पत्नी को प्राप्त कर सका। इसी कथा के आधार पर योगिनी एकादशी को रोग-मुक्ति और पाप-नाश करने वाला व्रत माना जाता है।
पूजा विधि
योगिनी एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही आरंभ हो जाती है, जब सात्विक भोजन ग्रहण कर तामसिक पदार्थों का त्याग किया जाता है। एकादशी तिथि के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात भगवान विष्णु की प्रतिमा को पीले वस्त्र पहनाकर चौकी पर स्थापित किया जाता है।
पूजा में भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत, फल तथा नैवेद्य अर्पित करना चाहिए, क्योंकि तुलसी के बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है। दिनभर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम तथा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। रात्रि में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करने की भी परंपरा है।
व्रत का पारण द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात निर्धारित शुभ मुहूर्त में किया जाता है। पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराना तथा दान-दक्षिणा देना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। जो भक्त निर्जला व्रत नहीं रख सकते, वे फलाहार करके भी इस व्रत का पालन कर सकते हैं।
व्रत के नियम
एकादशी व्रत के दिन चावल, दाल-अनाज का सेवन वर्जित माना जाता है। इस दिन क्रोध, छल-कपट और नकारात्मक विचारों से दूर रहते हुए मन को भगवान विष्णु की भक्ति में लगाना चाहिए। तुलसी के पत्ते तोड़ने की मनाही होती है, इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी दल एकत्र कर लेना चाहिए। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा सात्विक जीवनशैली अपनाना भी आवश्यक माना जाता है।
निष्कर्ष
10 जुलाई 2026 को पड़ने वाली योगिनी एकादशी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने तथा जीवन के पापों और रोगों से मुक्ति पाने का एक विशेष अवसर प्रदान करती है। हेम माली की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्चे मन से किया गया व्रत और भक्ति व्यक्ति के सबसे कठिन संकटों को भी दूर कर सकती है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को स्वास्थ्य, सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है।



