आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व कब से आरंभ है
वर्ष 2026 में आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व 20 जुलाई, सोमवार से आरंभ होगा। यह जैन कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तिथि तक, अर्थात आठ दिनों तक चलने वाला पवित्र पर्व है। जैन धर्म में इस पर्व को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे “अष्टाह्निका” अथवा “अठाई पर्व” के नाम से जाना जाता है।
अष्टाह्निका पर्व का महत्व
जैन मान्यताओं के अनुसार अष्टाह्निका पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है—कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में। इन तीनों अवसरों पर स्वर्गलोक से देवगण नंदीश्वर द्वीप पहुंचकर निरंतर आठ दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना करते हैं। नंदीश्वर द्वीप जैन ब्रह्मांड-शास्त्र के अनुसार एक दिव्य द्वीप माना जाता है, जहां 52 शाश्वत जिनालय (जिन मंदिर) स्थित हैं और जहां देवता तथा देवियां नियमित रूप से पूजा करते हैं।
चूंकि सामान्य मनुष्य नंदीश्वर द्वीप तक नहीं पहुंच सकते, इसलिए जैन श्रद्धालु अपने निकटवर्ती जिन मंदिरों में जाकर अष्टाह्निका पूजा करते हैं और इस प्रकार नंदीश्वर द्वीप की पूजा में सांकेतिक रूप से सम्मिलित होते हैं। यह मान्यता है कि इन आठ दिनों की भक्ति-पूजा से मिलने वाला पुण्य फल सामान्य छह महीने की पूजा से भी कहीं अधिक होता है।
अष्टाह्निका पर्व की कथा
जैन ग्रंथों में अष्टाह्निका पर्व की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार मैना सुंदरी नामक एक धर्मपरायण राजकुमारी के पति श्रीपाल कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। मैना सुंदरी ने अपने पति के रोग निवारण के लिए आठ दिनों तक सिद्धचक्र विधान मंडल की स्थापना कर तीर्थंकरों के अभिषेक जल से पति पर छींटे देते हुए कठोर साधना की। इस अष्टाह्निका साधना के प्रभाव से श्रीपाल कुष्ठ रोग से पूर्णतः मुक्त हो गए। पद्मपुराण में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है, जिसमें बताया गया है कि सिद्धचक्र के अनुसरण से कुष्ठ रोगियों को भी रोग से मुक्ति प्राप्त हुई थी।
पूजा विधि और अनुष्ठान
अष्टाह्निका पर्व के आठ दिनों के दौरान जैन मंदिरों में प्रतिदिन विशेष पूजा, सिद्धचक्र मंडल विधान, नंदीश्वर विधान तथा मंडल पूजा जैसे अनेक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु इन आठ दिनों में उपवास रखते हैं—कुछ लोग निरंतर आठ दिनों तक उपवास करते हैं, कुछ अंतराल से उपवास करते हैं, कुछ “कोमली अठाई” (हल्के उपवास) का पालन करते हैं, जबकि कुछ लोग एकासन (दिन में एक बार भोजन) व्रत रखते हैं।
नंदीश्वर द्वीप में सूर्य-चंद्रमा स्थिर रहते हैं, इसलिए वहां रात-दिन का कोई विभाजन नहीं होता। इसी कारण देवगण चौबीसों घंटे पूजा करते हैं, फिर भी रात्रि पूजन नहीं होता, क्योंकि नंदीश्वर द्वीप में रात्रि होती ही नहीं है। इसी दिव्य परंपरा के अनुकरण में जैन श्रद्धालु भी अपने मंदिरों में इन आठ दिनों तक विशेष रूप से अनुशासित और भक्तिपूर्ण दिनचर्या का पालन करते हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
अष्टाह्निका पर्व को जैन धर्म में तप और साधना का महापर्व माना जाता है। यह मान्यता है कि जो भक्त इस अवधि में संयम, साधना और आत्म-नियंत्रण का पालन करते हैं, उनके जीवन में बड़े से बड़ा संकट भी शीघ्र समाप्त हो जाता है। इस दौरान भक्त ध्यान, स्वाध्याय तथा आत्मा की शुद्धि के लिए विशेष प्रयास करते हैं और हर प्रकार की बुरी आदतों तथा नकारात्मक विचारों से स्वयं को मुक्त करने का प्रयत्न करते हैं।
यह भी माना जाता है कि जो साधक श्रद्धापूर्वक अष्टाह्निका व्रत का पालन करते हैं, वे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर तीव्र गति से अग्रसर होते हैं। जैन परंपरा में इसे अत्यंत उच्च कोटि का तप माना गया है, जो पुराने कर्मों के क्षय में सहायक होता है।
व्रत के नियम
अष्टाह्निका पर्व के दौरान जैन श्रद्धालु अहिंसा, सत्य, संयम तथा सात्विक जीवनशैली का कठोरता से पालन करते हैं। इन आठ दिनों में मंदिरों में नियमित रूप से जाना, पूजा-अर्चना में भाग लेना तथा धार्मिक प्रवचन सुनना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
निष्कर्ष
20 जुलाई 2026 से आरंभ होने वाला आषाढ़ अष्टाह्निका पर्व जैन धर्म के अनुयायियों के लिए तप, साधना और आध्यात्मिक शुद्धि का एक महत्वपूर्ण अवसर है। नंदीश्वर द्वीप की दिव्य पूजा परंपरा से जुड़ा यह आठ दिवसीय पर्व भक्तों को गहन आत्म-अनुशासन और भक्ति भाव में लीन होने का अवसर प्रदान करता है। श्रद्धापूर्वक इस पर्व का पालन करने से भक्तों को कर्म-बंधन से मुक्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।




