स्कंद षष्ठी कब है
वर्ष 2026 में स्कंद षष्ठी 18 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय, जिन्हें दक्षिण भारत में “मुरुगन” अथवा “सुब्रह्मण्यम” के नाम से भी जाना जाता है, को समर्पित है। यह व्रत विशेष रूप से तमिलनाडु, केरल तथा दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
स्कंद षष्ठी का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार तारकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकेगा। इस वरदान के कारण तारकासुर स्वयं को अजेय समझने लगा और उसने देवताओं पर अत्याचार करना आरंभ कर दिया, क्योंकि उस समय भगवान शिव विवाहित नहीं थे और उनका कोई पुत्र नहीं था।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, जिसके पश्चात भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। जन्म के कुछ ही दिनों में भगवान कार्तिकेय ने देवताओं की सेना का नेतृत्व करते हुए तारकासुर के विरुद्ध युद्ध किया और छठे दिन, अर्थात षष्ठी तिथि को, उसका वध कर दिया। इसी विजय की स्मृति में स्कंद षष्ठी का पर्व मनाया जाता है, जो अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है।
भगवान कार्तिकेय का स्वरूप
भगवान कार्तिकेय को युद्ध और साहस के देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें छह मुख वाला बताया गया है, इसी कारण उनका एक नाम “षडानन” भी है। उनका वाहन मोर है और उनके हाथ में वेल (भाला) नामक दिव्य अस्त्र होता है, जो उन्हें भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन को अत्यंत श्रद्धा से पूजा जाता है, और उनके छह प्रमुख निवास स्थान “अरुपदाई वीडु” के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनमें पलानी, तिरुचेंदूर, स्वामीमलाई, तिरुत्तनी, पझमुदिरचोलई और पझानी प्रमुख हैं।
स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व
स्कंद षष्ठी व्रत को शक्ति, साहस और विजय प्राप्त करने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें जीवन के संघर्षों और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त, विद्यार्थियों और युवाओं के लिए भी यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है, क्योंकि भगवान कार्तिकेय को बुद्धि और ज्ञान का भी आशीर्वाद देने वाला माना जाता है।
वर्ष में सबसे बड़ी स्कंद षष्ठी कार्तिक मास में मनाई जाती है, जिसे “कंद षष्ठी” के नाम से भी जाना जाता है और छह दिनों तक चलने वाले विशेष उत्सव के रूप में मनाई जाती है। परंतु प्रत्येक माह की शुक्ल षष्ठी को भी मासिक स्कंद षष्ठी के रूप में मनाने की परंपरा है, जिसका अपना विशेष धार्मिक महत्व है।
पूजा विधि
स्कंद षष्ठी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा अथवा चित्र की स्थापना कर उनका पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। पूजा में लाल पुष्प, विशेष रूप से कनेर के फूल, चंदन, धूप-दीप तथा फल अर्पित किए जाते हैं।
“ॐ सरवणभवाय नमः” अथवा “षडानन स्तुति” का जाप करना इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। कई भक्त इस दिन पूर्ण उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करके भी व्रत का पालन करते हैं। जो भक्त छह दिनों तक चलने वाले कंद षष्ठी व्रत का पालन करते हैं, वे पहले दिन से लगातार उपवास रखते हुए षष्ठी तिथि को पूर्ण भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत का समापन करते हैं।
मंदिरों में इस दिन विशेष अभिषेक, अर्चना तथा “सूरसंहारम” नामक धार्मिक नाट्य का आयोजन भी किया जाता है, जो तारकासुर वध की कथा को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करता है।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्कंद षष्ठी का व्रत करने से शत्रु बाधाओं से मुक्ति, साहस और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। यह व्रत नकारात्मक शक्तियों तथा बुरी नजर से रक्षा करने वाला भी माना जाता है। संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपती भी इस व्रत को विशेष श्रद्धा से करते हैं।
निष्कर्ष
18 जुलाई 2026 को पड़ने वाली स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय की शक्ति, साहस और विजय की आराधना का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलते हुए किसी भी बड़ी बुराई पर विजय प्राप्त की जा सकती है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को साहस, सुरक्षा और जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है।



