अनिरुद्ध चतुर्थी कब है
वर्ष 2026 में अनिरुद्ध चतुर्थी 17 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है, जिसे “विनायक चतुर्थी” के रूप में भी जाना जाता है। द्रिक पंचांग की परंपरा में प्रत्येक माह की शुक्ल चतुर्थी को अष्टविनायक अथवा भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों में से किसी एक के नाम पर मनाया जाता है, और आषाढ़ मास की इस चतुर्थी को “अनिरुद्ध चतुर्थी” कहा जाता है।
अनिरुद्ध चतुर्थी नाम का महत्व
“अनिरुद्ध” शब्द भगवान गणेश के “एकदंत” स्वरूप से जुड़ा हुआ माना जाता है, जो अष्टविनायक के आठ प्रमुख स्वरूपों में से एक है। यह मान्यता है कि भगवान गणेश का यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और अजेय है, जिसे कोई भी शक्ति रोक अथवा बाधित नहीं कर सकती—इसी कारण उन्हें “अनिरुद्ध” (जिसे रोका न जा सके) कहा गया है। यह नाम भगवान गणेश की उस शक्ति का प्रतीक है, जो सभी बाधाओं और विघ्नों को पार करते हुए अपने भक्तों के मार्ग को सुगम बनाती है।
शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सामान्यतः विनायक चतुर्थी कहा जाता है, जो कि कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी से भिन्न होती है। जहां संकष्टी चतुर्थी संकटों के नाश के लिए मनाई जाती है, वहीं विनायक चतुर्थी नई शुरुआत, सुख-समृद्धि और शुभता प्राप्त करने के लिए मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाली नई योजनाओं और कार्यों में सफलता प्राप्त होने की मान्यता है।
भगवान गणेश की पूजा का महत्व
हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पूर्व भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा है, क्योंकि उन्हें प्रथम पूज्य देवता तथा विघ्नहर्ता माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश जी को बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि का देवता माना जाता है। उन्हें रिद्धि-सिद्धि का दाता भी कहा जाता है, जो अपने भक्तों को सांसारिक सुख-समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी प्रदान करते हैं।
अनिरुद्ध चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की आराधना करने से विशेष रूप से नए कार्यों, व्यापार, विवाह अथवा अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में सफलता प्राप्त होने की मान्यता है। जो लोग जीवन में किसी बड़े बदलाव अथवा नई शुरुआत की तैयारी में हैं, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
पूजा विधि
अनिरुद्ध चतुर्थी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा में गणेश जी को दूर्वा (घास), लाल पुष्प, सिंदूर तथा मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करना चाहिए, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय माने जाते हैं।
पूजा के दौरान “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए तथा गणेश चालीसा, गणेश अष्टोत्तरशतनामावली अथवा गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। दिनभर व्रत रखने के पश्चात संध्या समय पुनः पूजा-अर्चना कर चंद्रमा के दर्शन से पूर्व अथवा निर्धारित शुभ समय पर व्रत का पारण किया जाता है।
इस दिन गणेश जी को इक्कीस दूर्वा अर्पित करने की विशेष परंपरा है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। साथ ही, इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना तथा जरूरतमंदों को दान देना भी पुण्यदायी माना जाता है।
व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनिरुद्ध चतुर्थी अथवा विनायक चतुर्थी का व्रत करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है तथा नए कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। यह व्रत विशेष रूप से विद्यार्थियों, व्यापारियों तथा नई परियोजनाओं पर कार्य कर रहे लोगों के लिए फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, यह भी मान्यता है कि नियमित रूप से गणेश जी की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
व्रत के नियम
इस दिन तामसिक भोजन तथा नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। भगवान गणेश की पूजा में तुलसी पत्र का प्रयोग वर्जित माना जाता है, इसलिए इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। दिनभर संयम और भक्ति भाव बनाए रखते हुए ईश्वर की आराधना में मन लगाना चाहिए।
निष्कर्ष
17 जुलाई 2026 को पड़ने वाली अनिरुद्ध चतुर्थी भगवान गणेश के अजेय और शक्तिशाली स्वरूप की आराधना का विशेष अवसर है। यह दिन नई शुरुआत, सफलता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भक्तों को गणपति बप्पा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन के सभी विघ्न दूर होकर सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।



